इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
प्रकृति परम् ब्रम्ह की ब्यवस्था
का नाम है । व्यवस्था जो परम् ब्रम्ह ने इस सृष्टि की रचना, विकास, समंवय और विध्वंस के लिये रची है । समस्त को एक नाम
से व्यक्त किया गया प्रकृति । व्यवस्था जिसमें व्यवस्थाकार प्रत्यक्ष दृष्टिगत
नहीं होता है । व्यवस्था जो न्याय पर आधारित है । व्यवस्था जिसमें कर्म निर्णायक
अवयव है । समन्वय कर्म के आधार पर है ।
तीन शब्द मंत्र, यंत्र, तंत्र । मंत्र किसी एक विशिष्ट प्रयोजन के लिये होता
है । इसका ज्ञाता या साधक एक एकाकी ब्यक्ति होता है । मंत्र का फल भी एक एकाकी
साधक को ही मिलता है । यथा शंकर भगवान को प्रसन्न करने के लिये जो मंत्र होगा उसे
जो एक ब्यक्ति सिद्ध करेगा उसे भगवान शंकर की कृपा से मिलने वाले फल मिलेंगे । इसी
प्रकार यदि विज्ञान के क्षेत्र में विद्युत प्रवाह का सूत्र सिद्धांत जो ब्यक्ति सीखेगा
अभ्यास करेगा वह विद्युत प्रवाह के प्रयोजनों में उपयोगी उपलब्धियाँ कर सकेगा ।
यंत्र निर्मित होता है अनेको मंत्रों के समंवित प्रयोग से । इसका साधक आवश्यक नहीं
कि उस यंत्र में प्रयुक्त विविध मंत्रों का ज्ञाता हो । यंत्र को संचालित करने का
ज्ञान मात्र से यंत्र का प्रयोग कोई भी कर सकता है । यंत्र का लाभ वह पायेगा जो भी
उस यंत्र की सीमा के अंतर्गत होगा । यथा बिजली से चलने वाला पंखा जो भी चाहे स्विच
को दबायेगा पंखा चलेगा और जो भी उसके सामने होगा उसे हवा मिलेगी । इसे चलाने वाले
को इस यंत्र के निर्माण में प्रयुक्त विभिन्न सिद्धांतों का ज्ञान होना आवश्यक
नहीं होता । फिर इससे भी ब्यापक होता है तंत्र । जैसे प्रजातंत्र । यह ब्यापक होता
है अपने स्वरूप से भी विस्तार से भी । इसमें असंख्य मंत्र तथा यंत्र का समावेश
रहता है । इसका प्रभाव क्षेत्र भी ब्यापक रहता है । देश की भौगोलिक सीमाँओं तक
प्रजातंत्र के संदर्भ में । तंत्र के संचालन का संविधान रहता है । परंतु इसका
प्रभाव पूरे क्षेत्र पर रहता है चाहे उसके क्षेत्र में रहने वाले को उस संविधान का
ज्ञान हो अथवा ना हो । जिस प्रकार प्रजातंत्र में यदि कोई नियम संविधान में है तो
वह उसके प्रभाव क्षेत्र के हर नागरिक पर लागू है चाहे वह नागरिक उसे न जानता हो ।
नियम का उलंघन होने की दशा में कानूनी कार्यवाही की जावेगी । इसी प्रकार लाभ भी
मिलते हैं ।
प्रकृति परम् ब्रम्ह की ब्यापक
ब्यवस्था है । ब्रम्ह के संविधान के बिपरीत कर्म करने की दशा में प्रकृति दण्डित
करती है । प्रकृति की कार्यशैली न्याय पर आधारित होती है । प्रकृति पूर्णतया
अनुशासित होती है । इसका समस्त संचालन कर्म के आधार पर है । मनुष्य शरीर में कर्ता
आत्मा होती है । उसे पूर्णतया प्रकृति के अनुशासन में कर्म सम्पादन अनिवार्य
वाँक्षना होती है ।
प्रभु नारायण
श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें